जहाँ  भी देखा तू ही तू नजर आया दसों  दिशाओं  में,
कोई जगह खाली नहीं यहाँ निगाहों से तुझे आसमानी देखता हु|

जो कुछ भी है मेरे पास तेरा ही तो दिया हुआ है,
तेरे दीदार का ख्वाहिशमंद ,ये अल्फाज तेरे नाम लिखता हु|

कैसे मानु खुद को जिन्दा मर -मर कर जीता हु,
जो फ़ना हो गए तेरी रहो में,उनकी बाते बेजुबानी लिखता हु|

अपनी ओलाद से ज्यादा कुछ नहीं दुनिया में,
फुल जो चढ़ गए तेरे चरणों में,पतंगो पर उनके नाम लिखता हु|

सारे शहर को मार गए कुछ नौनिहाल उस पहाड़ से,
बेबसी की खाई में ,मदद के हाथो से,करम इंसानी लिखता हु|

कोई देता नहीं आवाज किसी को ,सुनने वाला कोई नहीं,
कफ़न पर सन्नाटे से,मरघट में बात जिस्मानी लिखता हु |

हम नंगे पांव चलने वाले लोग|

अपने अपने दायरे के होंगे लोग गुलाम ,
दायरे तोड़ निकलते है हम  नंगे पांव चलने वाले लोग|
जितनी बड़ी सरहदे उतने बड़े बंधन ,
बेड़िया तोड़ निकलते है, हम नंगे पांव चलने वाले लोग|
दुरिया होती होगी तुम्हारे नक़्शे में ,
फासले माप लेते है मंजिल तक,हम नंगे पांव चलने वाले लोग|
चाँद सितारों को निगाह में रखने वालो,
पत्थर की ठोकर बन जाते है,हम नंगे पांव चलने वाले लोग|
रोशनियों  के कारवा चुक जाते है,तिल तिल
अँधेरे को चीर कर निकल जाते है ,हम नंगे पांव चलने वाले लोग|
सर्दी गर्मी बारिश तूफान के खौफ-अ-मंज़र,
नंगे बदन सब सह लेते है हम नंगे पांव चलने वाले लोग|
तेरे लाल कालीन पर कभी सजदा नहीं करेंगे,
हर चीज को रौंद डालते है,हम नंगे पांव चलने वाले लोग|

माँ

आसमा थोडा और ऊँचा हो जाये ,

ताकि मेरी उचाइयो को थोड़ी जगह मिले|

कूद कूद कर गिर जाता हु धरती पर ,

ऊँची कूद की थोड़ी और गुंजाईश मिले|

जब जब भी टकरा कर तुमसे ,

जहा भी गिरा फूल ही खिले|

मैंने पाया सिर्फ मेहनत ही मेरी थी ,

उचाइयो के होंसले तो तुम से मिले|

जब जब पुरजोर कोशिश की ,

मैंने जमीन के सुब मजबूत स्तम्भ हिले|

देखते देखते हो गए कितने छोटे,

जमाने के राज-ए-सुल्तान गर्वीले|

खुदा रहता है माँ के रूप में जहाँ में ,

बस उनके चरणों में मेरी इबादत मिले |

आसमा थोडा और ऊँचा हो जाये ,

ताकि मेरी उचाइयो को थोड़ी जगह मिले|