जहाँ  भी देखा तू ही तू नजर आया दसों  दिशाओं  में,
कोई जगह खाली नहीं यहाँ निगाहों से तुझे आसमानी देखता हु|

जो कुछ भी है मेरे पास तेरा ही तो दिया हुआ है,
तेरे दीदार का ख्वाहिशमंद ,ये अल्फाज तेरे नाम लिखता हु|

कैसे मानु खुद को जिन्दा मर -मर कर जीता हु,
जो फ़ना हो गए तेरी रहो में,उनकी बाते बेजुबानी लिखता हु|

अपनी ओलाद से ज्यादा कुछ नहीं दुनिया में,
फुल जो चढ़ गए तेरे चरणों में,पतंगो पर उनके नाम लिखता हु|

सारे शहर को मार गए कुछ नौनिहाल उस पहाड़ से,
बेबसी की खाई में ,मदद के हाथो से,करम इंसानी लिखता हु|

कोई देता नहीं आवाज किसी को ,सुनने वाला कोई नहीं,
कफ़न पर सन्नाटे से,मरघट में बात जिस्मानी लिखता हु |

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