kumhar

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कल किसी ब्लॉग पर लिखा देखा था
“””””धर्म इंसानों के लिए बने है,,, न की इंसान धर्म के लिया……”””””

मेरे पापा के द्वारा लिखी गई

 जब में इस जग में आया,माँ हरषाई …….

 बुआ ने गीत गया,बहनों ने थाली बजाई …..

सभी समझे आज मै सुखी,पर मेने ख़ुशी नहीं पाई .

 कितना अभागा,बदनसीब,बात बड़ी दुखदाई ………….

तेरे खजाने में सब कुछ था,क्या कमी आई ………….

बाप की पदवी तो दो बार पाई…..

 पर इस घर में तुने बेटी नहीं भिजवाई …………

 इतनी मेहर तो मालिक अब कर देना ………………..

तेरे खजाने में कोई कमी नहीं खलेगी ………….

जब मेरे आँगन में पोती चहकेगी ………………..

स्व. प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी

स्वयं अहम् की थी मतवाली
प्रजातंत्र की कर रखवाली
धाय बनी वह हिंद देश की
नवयुग की घर घर की गंगा चली

महतारी बन जग में छाई
त्रिकाल त्रिलोक में पहचान बनायीं
इंच इंच पर विश्वास घात हुआ
दिन निकला और दीपक शांत हुआ
रख कर दिया तन वज्र हुतात्मा का
 गांव शहर देश की आत्मा का
वह तो उपहार था आपको परमात्मा का

नवम्बर १९८४, “”मतवाला राही”” में प्रकाशित
शेष राज प्रजापति का शब्दांकन

मुर्दा

एक मुर्दा आधा जलाया,आधा गाड दिया,
उसका किया तिया और पढ़ा  गया फातिया,
फुल हरिद्वार ले जाये या रहने दे शमशान ,
पता नहीं वह हिन्दू था या मुसलमान,
न जाने उस पर किसका हक़ था,
कुछ भी हो अछे इन्सान का कितना बुरा हस्र   था,

चाहत

कोई रौशनी कोई चमक नहीं मुझमे,
फिर भी चाहत है की जुगनू या सितारा हो जाऊ,
कोई कशिश नहीं कोई फन  नहीं,
लेकिन दुआ करो लोगो की सबका प्यारा हो जाऊ..
कभी पढ़ नही पाया, कभी लिख नहीं पाया,
 चाहता हु की कित्ताबो में जगह पा जाऊ .
पूजा कर नही पाया, नमाज अदा कर नहीं पाया,
चाहता हु की प्रभु की कृपा पा जाऊ.
दान कर नहीं पाया,  मदद दे नहीं पाया,
चाहू की जन्नत पा जाऊ,
कभी हिलने की कोशिश नहीं की,  कभी चल नहीं पाया,
आज चाहता हु कि परिंदों के से पंख पा  जाऊ.

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